श्री नवग्रह चालीसा लिरिक्स | Shri Navgrah Chalisa Lyrics
Shri Navgrah Chalisa Lyrics In Hindi
श्री नव ग्रह चालीसा का पाठ करने से जीवन मे ग्रहो के योग से उत्पन्न विकारों से सहजता पूर्वक निपटने की ऊर्जा प्राप्त होती है। ग्रह दोषों से मुक्ति एवं सफलता और संवृद्धि से जीवन में उन्नति के अवसर बढ़ते हैं। नवरात्रि में इसका विशेष महत्व माना गया है।नवग्रह चालीसा का पाठ
|| दोहा ||
सूर्य-राम, शशि कृष्ण है,मंगल नरहरिरूप,
बुध बौद्ध, वामन गुरु,
भार्गव शुक्र स्वरुप ||
श्री वराह राहू प्रबल,
शनि कूर्म भगवान्,
केतु मत्स्य अवतार है,
नवग्रह देव महान ||
चौपाई
जय नवग्रह सर्वज्ञ सनातन,गृह रूपी भगवान् जनार्दन ||१||
सब जग पर अधिकार आपका,
फल देते हो पुण्य-पाप का ||२||
जय प्रारब्ध कर्म फल दाता,
गृह स्वरुप भगवान् विधाता ||३||
ग्रहाधीन सब जग बताये,
गृह विशेष फल राज्य दिलाये ||४||
काल नवग्रह के आधीना,
धनपति और करे धनहीना ||५||
तीन लोक जिसका यश छाया,
कालचक्र नवग्रह की माया ||६||
ग्रह सुख सम्पति, सन्तति दाता,
जीवन के ग्रह भाग्य विधाता ||७||
आयु सुख आरोग्य प्रदाता,
दुःख दारिद्रय कष्ट के दाता ||८||
उत्पति स्थिति प्रलय के कारण,
ग्रह ब्रम्हा-शंकर-नारायण ||९||
शुभ ग्रह सौम्य सदा सुखदाता,
क्रूर पाप ग्रह दुःख प्रदाता ||१०||
देव स्वरुप नव ग्रह सारे,
आश्रित जन के संकट टारे ||११||
जय श्री ग्रह मण्डल अधिनायक,
सूर्य देव भाष्कर बल दायक ||१२||
मेष उच्च शुभ सुख फलदाता,
सिंह राशि अधिपति विख्याता ||१३||
अन्धकार अज्ञान निवारक,
ज्ञान और विज्ञान प्रकाशक ||१४||
जय श्री चंद्रदेव सुखकारी,
कर्क राशि अधिपति तमहारी ||१५||
शिव मस्तक पर सदा सुशोभित,
सुन्दरता पर विश्व विमोहित ||१६||
सौम्य शांत, शुभ शीतल स्वामी,
वृषभ उच्च जय सोम नमामि ||१७||
तेज कान्ति विद्युत सैम भारी,
जय मंगल ग्रह अति बलकारी ||१८||
धरणी सूत, ऋण, विनाश कर्ता,
उच्च राशि, मकर दुःखहर्ता ||१९||
वृश्चिक, मेष दशम शुभ मंगल,
दूर करे जग सदा अमंगल ||२०||
चंद्रात्मज अति सौम्य स्वरूपा,
कन्या मिथुन राशि बुध भूपा ||२१||
कन्या स्थित बुध उच्च कहाये,
यश बुद्धि व्यापार बढाये ||२२||
अति सुन्दर प्रिय रूप तुम्हारा,
कष्ट दुःख बुध, हरो हमारा ||२३||
जय गुरुदेव वृहस्पति देवा,
दूर नर मुनिजन करते सेवा ||२४||
धनु मीन पति शुभ फल दायक,
कर्क उच्च नर भाग्य विधायक ||२५||
जगद्गुरु ग्रह गुरु कहाये,
करो कृपा जग शुभ फल पावे ||२६||
सर्व शास्त्र के प्रखर प्रवक्ता,
शुक्र कवि भार्गव विधि वक्ता ||२७||
असुर परम गुरु शुक्र नमामि,
वृषभ तुला राशि के स्वामी ||२८||
विद्या बुद्धि नीति धन दाता,
उच्च मीन शुभ योग प्रदाता ||२९||
सूर्य पुत्र ग्रह महा भयंकर,
यम अग्रज गति मंद शनैश्चर ||३०||
मकर कुम्भ राशि अधिकारी,
शनि देव जयकार तुम्हारी ||३१||
तुला उच्च शनि शुभफल देता,
दुख दैन्य पीड़ा हर लेता ||३२||
सूर्य-चन्द्र ग्रहण जब आता,
राहू ग्रह कारण कहलाता ||३३||
राहू अशुभ और शुभ दाता,
महाबली दुख कष्ट प्रदाता ||३४||
कारक मारक द्वय यह रूपा,
छाया ग्रह अति उग्र स्वरूपा ||३५||
मस्तक हीन केतु ग्रह छाया,
राहू का अवशेष कहाया ||३६||
शुभ अरु अशुभ केतु फल देता,
श्रेष्ठ कार्य फल यह हर लेता ||३७||
राहू-केतु जग के दुख हरना,
अनुकम्पा सब जग पर करना ||३८||
वेद नयन ज्योतिष कहलाता,
कर्म भेद प्रारब्ध बताता ||३९||
नव ग्रह सब इसमे फल दायक,
विद्या सम्पत्ति पुत्र प्रदायक ||४०||
उच्च नीच सं शत्रु मित्र है,
ग्रह गति माया अति विचित्र है।
पठन करे "नवग्रह चालीसा"
सुख सम्पत्ति सुत-हो अवनीशा ||
भय बन्धन संकट कट जाये,
अनुकम्पा नवग्रह की पाये।
यह पुरूशास्त्र चतुष्टय दायक,
सदा सर्वदा विजय प्रदायक ||
दोहा
करे कृपा जग पर सदा,सूर्य चन्द्र बलवान,
भौम बुध गुरु कवि शनि,
राहू केतू महान || १||
महादशा, अन्तर दशा,
गृह गोचर प्रतिकूल,
पठन मात्र से वे सदा,
होते हैं अनुकूल ||२||
आयु बल आरोग्यता,
सम्पत्ति जय समान,
इनके पढ़ने से बढ़े,
मिटे ब्याधि अज्ञान ||३||
पूर्ण कृपा नव गृह करे,
ग्रह शांति हो जाय,
भक्त "शिवाकान्त" प्रार्थना,
नवग्रह करे सहाय ||
|| श्री सूर्यादि नवग्रह देवताभ्यो नमः ||
श्री नव ग्रह मंत्र
* श्री सूर्य - ॐ हां ह्वी ह्वों सः सूर्याय नमः।* श्री चन्द्र - ॐ श्रां श्रीं श्रो सः चन्द्रमसे नमः।
* श्री मंगल - ॐ क्रां क्री क्रों सः भौमाय नमः।
* श्री बुद्ध - ॐ ब्रां ब्रीं ब्रों सः बुद्धाय नमः।
* श्री गुरु - ॐ ग्राँ ग्रीं ग्रों सः गुरुवे नमः।
* श्री शुक्र - ॐ द्रां द्रीं द्रों सः शुक्राये नमः।
* श्री शनि - ॐ प्रां प्रीं प्रों सः शानये नमः।
* श्री राहु - ॐ भ्राँ भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः।
* श्री केतु - ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रों सः केतवे नमः ||
श्री नव ग्रह विशेष मंत्र
ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु:,शशि भूमि सुतो बुधश्च,
गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव,
सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु ||१||
गतम दुखम गतम पापम,
गतम दारिद्रयमेव च,
आगंत सुख सम्पत्ति च,
नित्यं नवग्रह दर्शनाय ||२||