श्री हरतालिका तीज व्रत कथा सम्पूर्ण | Shri Hartalika Teej Vrat Katha
Shri Shri Hartalika Teej Vrat Katha Pooja Vidhi
श्री हरितालिका व्रत करने वाला प्राणी सूर्योदय से पहले उठे और भगवान शंकर का स्मरण फिर शौचादि नित्य कर्म से निव्रत होकर स्नान ध्यान करके शिवालय में जाये जहां पर कथा सुननी हो तथा पूजन के लिए केले के वन्दनबार इत्यादि अनेक पुष्प मालाओं से सुसज्जित एक सुंदर मंडप तैयार करे जिसमे स्वयं बंधु बांधुओं सहित बैठ श्रद्धा सहित अपने आचार्य अथवा विद्वान पंडित को बुलाकर उन्हे आसन पर बिठायेँ।तब हाथ में कुशा और जल लेकर "ॐ अद्योहं " इत्यादि से यथाविधि संकल्प कर
इसके बाद अक्षत फल लेकर मन्दार माला मंत्र से श्री शिव पार्वती जी का ध्यान करे।
|| अथ ध्यानम ||
*आगच्छ देवि मंत्र द्वारा आवाहन करके,*शिवे शिवे प्रिये मंत्र से पाद्य दे।
* संसार ताप मंत्र से अर्घ्य दे।
* राज सौभाग्य के मंत्र द्वारा आचमन करावें।
*तत्पश्चात स्वर्ण की बनी बाती पार्वती की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करावें और फिर मंदाकिनी मंत्र से शुद्ध जल से स्नान करावें।
*ब्रह्मा युग्म मंत्र द्वारा वस्त्रों का जोड़ा अर्पण करे।
* चंदेन मंत्र द्वारा चन्दन लगायें।
* रजिते मंत्र मंत्र से अक्षत (चावल) चढ़ादे।
* माल्यादीन मंत्र से फूल चढ़ा दे।
* चंदना गुरु मंत्र से धूप दें।
* त्यां, त्वं, ज्योति मंत्र पढ़कर दीपक जलायें।
* नैवेद्य मंत्र से नैवेद्य अर्पण करे।
* इदम फलं मंत्र से फल अर्पण करे।
* पुंगीफलं आदि मंत्र को पढ़कर पान का बीणा अर्पण करे।
* शौभाग्य मंत्र के द्वारा प्रार्थना करे।
|| श्री गनेशाय नमः ||
श्री हरतालिका व्रत कथा
*अथ हरतालिका व्रत कथा सुनों जो इस तरह है जिसके दिव्य वेश राशि पर मंदार (आक ) पुष्प की माला शोभा देती है जिस भगवान चन्द्रशेखर के कण्ठ मे मुंडो की मालायें पड़ी हुई है जो माता पार्वती दिव्य वस्त्रो से (भगवान शंकर) दिगम्बर वेष धारण किए हैं उन दोनों भगवती तथा शंकर को नमस्कार करता हूँ कैलाश पर्वत के शिखर पर माता पार्वती ने महादेव से पूछा हे महेश्वर ! अब हमसे आप गुप्त से गुप्त वार्ता कहिए।* जो सबके लिए सब धर्मों से सरल हो अथवा महान फल देने वाली हो। हे नाथ ! अब आप हमसे भली भांति प्रसन्न होकर आप मेरे सम्मुख प्रकट कीजिये।
* हे नाथ आप यदि मन्य और अंत रहित हैं आपकी माया का कोई पार नहीं है अब हम आपको किस प्रकार प्राप्त करे और कौन-कौन से दान, पुण्य फल से आप हमें वर के रूप में मिलें।
* तब महादेव जी बोले हे देवी ! सुनों मै उस व्रत को कहता हूँ जो परम गुप्त है मेरा सर्वस्य है।
* जैसे तारागणों मे चंद्रमा, गृहों मे सूर्य, वर्णो मे ब्राह्मण और देवताओ में गंगा, पुराणों मे महाभारत, वेदों मे साम, इंद्रियों में मन श्रेष्ठ है।
*वैसे पुराण, वेद में इसका वर्णन आया है।
* जिसके प्रभाव से तुमको मेरे आसान प्राप्त हुआ है। हे प्रिये ! यही मै तुमसे वर्णन करता हूँ।
* अब सुनो भादों मास के शुक्ल पक्ष के हस्त नक्षत्र तृतीया तीज के दिन को इस व्रत का अनुष्ठान करने से सब पापों का नाश हो जाता है।
* हे देवी ! सुनो तुमने पहले हिमालय पर्वत पर इस व्रत को किया था जो मै सुनाता हूँ।
* पार्वती जी बोली हे प्रभु ! इस व्रत को मैंने किस लिए किया था वह सुनने की इच्छा है सो कहिये।
* शंकर जी बोले आर्याव्रत मे हिमांचल नामक एक पर्वत है जहां अनेक प्रकार की भूमि अनेक प्रकार के वृक्षों से सुशोभित है।
* जिन पर अनेक प्रकार के पक्षीगण रहते हैं अनेक प्रकार के मृग आदि जहां विचरण करते हैं जहां देवता गन्धर्वों सहित किन्नर आदि सिद्धजन रहते हैं।
* गंधर्व गण प्रसन्नता पूर्वक गान करते हैं पहाड़ों के शिखर कंचन मणि वेंद्वर्य आदि सुशोभित रहते हैं।
* वह गिरिराज आकाश को अपना मित्र जानकार अपने शिखर रूपी हाथ से छूता रहता है जो सदैव बर्फ से ढका हुआ गंगा जी की कल-कल ध्वनि से शब्दायमान रखते हैं।
* हे गिरजे ! तुमने बाल्यकाल में इसी स्थान पर तप किया था बारह साल नीचे को मुख करके ध्रुम्रपान किया। तब फिर चौंसठ वर्ष तुमने बेल के पत्ते भोजन करके ही तप किया। माघ के महीने में जल में रहकर तथा वैशाख में अग्नि में प्रवेश करके तप किया।
* श्रावण महीने में बाहर खुले में निवास कर अन्न जल त्याग तप करती रहीं तुम्हारे कष्ट को देख तुम्हारे पिता को चिंता हुई।
* वे चिंतातुर होकर सोचने लगे की मै इस कन्या को किसके साथ वरण करूँ। तब इस अवसर पर देवयोग से ब्रम्हाजी के पुत्र देवर्षि नारद जी वहाँ आये।
* देवर्षि नारद जी तुमको ( शैल पुत्री ) देखा। तो तुम्हारे पिता हिमांचल ने देवर्षि को अध्य पदम आसान देकर सम्मान सहित बिठाया और कहा।
* हे मुनिवर ! आज आपने यहाँ तक आने का कैसे कष्ट किया? आज मेरा अहोभाग्य है की आपका शुभागमन यहाँ पर हुआ कहिये क्या आज्ञा है?
* तब नारद जी बोले - हे गिरिराज ! मै भगवान विष्णु का भेजा हुआ आया हूँ, तुम मेरी बात सुनो आप अपनी लड़की को उत्तम वरदान करे।
* ब्रह्मा, इंद्र, शिव, आदि देवताओं में विष्णु के समान कोई नहीं है। इसलिए तुम मेरे मत से आप अपनी पुत्री का दान विष्णु भगवान को दे।
* हिमांचल बोले यदि भगवान वासुदेव स्वयं ही पुत्री को गृहण करना चाहते हैं तो फिर इसी कार्य के लिए ही आपका आगमन हुआ है तो यह मेरे गौरव की बात है मै अवश्य उनको ही दूँगा।
* हिमांचल की यह कथा सुनते ही देवर्षि नारदजी आकाश में अंतर्ध्यान हो गए और शंख चक्र, गदा, पदम एवं पीताम्बरधारी विष्णु के पास पहुचे।
* नारदजी ने हाथ जोड़कर विष्णु से कहा हे प्रभु ! आपका विवाह कार्य निश्चित हो गया है।
* यहाँ हिमांचल ने प्रसन्नतापूर्वक कहा हे पुत्री ! मैंने तुमको गरुणध्वज श्री हरि विष्णुजी को अर्पण कर दिया है।
* पिता की इन बातों को सुनकर श्री पार्वती जी अपनी सहेली के घर गयी और पृथ्वी पर गिरकर अत्यंत दुखित होकर विलाप करने लगी।
* उनको विलाप करते हुये देखकर सखी बोली हे देवी ! तुम किस कारण से दुख पाती हो मुझे बताओ।
* मै अवश्य तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगी। तब पार्वती बोली हे सखी ! सुन मेरी जो मन की अभिलाषा है अब वह मै सुनाती हूँ।
* मै महादेव जी को वरणा चाहती हूँ इसमे संदेह नहीं है मेरे इस कार्य को पिताजी ने बिगाड़ना चाहा है।
* इसलिए मै अपने शरीर का त्याग करूंगी तब पार्वती के इन वचनों को सुनकर सखी ने कहा।
* हे देवि ! जिस वन को पिताजी ने देखा न हो तुम वहाँ चली जाओ। तब हे देवि पार्वती जी तुम अपनी उस सखी का यह वचन सुनकर ऐसे वन को चली गयी।
* पिता हिमांचल तुमको घर पर ढूँढने लगे और सोचा की मेरी पुत्री को या तो कोई देव दानव अथवा किन्नर हरण कर ले गया है।
* मैंने नारद जी को यह वचन दिया था कि मै अपनी पुत्री को गरुणध्वज भगवान के साथ वरण करूंगा। हाय अब यह किस तरह पूरा होगा। ऐसा सोचकर बहुत चिंतातुर हो मूर्छित हो गए।
*तब सब लोग हाहाकार करते हुये दौड़े आए और मूर्छा नष्ट होने पर गिरिराज से बोले हमें अपनी मूर्छा का कारण बताओ।
* हिमांचल मेरे दुख का कारण यह है कि मेरी रत्न रूपी कन्या का कोई हरण कर ले गया है या सर्प डस गया अथवा किसी सिंह या ब्याघ्र ने मार डाला है।
* न जाने वह कहाँ चली गई या उसे किसी राक्षस ने मार डाला है। इस प्रकार कहकर गिरिराज दुखित होकर इस तरह काँपने लगे जैसे तीव्र वायु चलने पर कोई वृक्ष काँपता हो।
* तत्पश्चात हे पार्वती जी तुमको गिरिराज सखियों सहित घने जंगल में ढूँढने निकले सिंह व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओ के कारण महा भयानक प्रतीत होता था।
* तुम भी सखी के साथ जंगल मे एक नदी के तट पर एक गुफा मे पहुंची।
* उस गुफा में तुम अपनी सखी के साथ प्रवेश कर गयी जहां तुम अन्नदान का त्याग करके बालू का लिंग बनाकर मेरी आराधना करती रहीं।
* उसी स्थान पर भद्र मास कि हस्त नक्षत्रयुक्त तृतीया के दिन तुमने विधि-विधान से पूजन किया तब रात्री को मेरा आसान डोलने लगा मै उस स्थान पर आ गया जहां तुम और तुम्हारी सखी दोनों थी।
* मैंने आकर तुमसे कहा है कि मै तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे वरदान मांगो तब तुमने कहा हे देव ! यदि आप मुझसे प्रसन्न है तो आप महादेव जो मेरे पति हो।
* मै तथास्तु ऐसा ही होगा कहकर कैलास पर्वत को चला गया। तुमने प्रभात होते ही उस बालू कि प्रतिमा को नदी में विसर्जित कर दिया।
* हे शुभे ! तुमने वहाँ अपनी सखी सहित व्रत का पारायण किया इतने मे हिमबान भी तुम्हें ढूंढते हुये उसी वन मे आ पहुचे।
* वह चारो ओर तुम्हें न देखकर मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े उस समय नदी के तट पर दो कन्याओं को देखा।
* तो वे तुम्हारे पास आ गए तुम्हें हृदय से लगाकर रोने लगे और बोले तुम इस सिंह व्यघ्रादि घने जंगल क्यू चली आई।
* पार्वती जी बोली ( तुमने कहा) हे पिता ! सुनिए मैंने पहले ही अपना शरीर शंकर जी को समर्पित कर दिया था किन्तु आपने इसके विपरीत कार्य किया इसलिए मै वन चली आई।
* ऐसा सुनकर हिमवान ने फिर तुमसे कहा कि मै तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध यह कार्य नहीं करूंगा। तब वे तुमको लेकर घर आए और तुम्हारा विवाह हमारे साथ कर दिया।
* हे प्रिये ! उसी व्रत के प्रभाव से तुमको यह मेरा अर्ध्दासन प्राप्त हुआ है। इस व्रत राज को मैंने अभी तक किसी के सम्मुख वर्णन नहीं किया है।
* हे देवि ! अब मै तुमको बताता हूँ सो मन लगाकर सुनो इस व्रत का नाम व्रत राज क्यू पड़ा? तुमको सखी हरण करके ले गयी थी। इस लिए व्रत का हरितालिका नाम पड़ा।
* पार्वती जी बोलि हे स्वामी आपने इस व्रतराज का नाम तो बताया किन्तु मुझे इसकी विधि और फल भी बताइये इसके करने से किस फल कि प्राप्ति होती है।
* तब शंकर जी बोले कि स्त्री जाति के लिए अत्युत्तम व्रत कि विधि सुनाइये। सौभाग्य कि इच्छा रखने वाली स्त्री इस व्रत को विधिपूर्वक करे।
* उसमे केले के खंभो से मंडप बनाकर बंदनवारों से सुशोभित करे। ऊसमे विविध रंगो से रेशमी वस्त्र की चाँदनीतान देवें।
* फिर चन्दन आदि से सुगंधित द्रव्यों से लेपन करके स्त्रियाँ एकत्र हो शंख, भेरखी, मृदंग बजावें।
* विधिपूर्वक मंगलाचार ( गीतवाद्य ) करके गौरा और शंकर स्वर्ण निर्मित प्रतिमा स्थापित करें।
* फिर शिवजी व पार्वती जी का गंध धूप, दीप, पुष्प, आदि से विधि सहित पूजन कर अनेक प्रकार के नैवेद्य (मिठाइयाँ) का भोग लगा दे और रात का जागरण करें।
* नारियल सुपारी, जवारी, नीबू, लौंग, अनार, नारंगी आदि फलों को एकत्रित करके धूप, दीप आदि मंत्रो द्वारा पूजन करे।
* फिर मंत्रोच्चारण करे। शिवाए से लेके उमयास तक के मंत्रो मे प्रार्थना कर अथ प्रार्थना-
* मन्त्रार्थ है कल्याण स्वरूप शिव है मंगल रूप महेश्वर हे शिवे ! आप हमें सब कामनाओ को देने वाली देवीकल्याण रुपे तुमको नमस्कार है।
* कल्याण स्वरूप माता पार्वती जी हम आपको नमस्कारकरते हैंऔर श्री शंकर जी को सदैव नमस्कार करते हैं ब्रम्ह रूपणी जगत का पालन करने वाली माता जी आपको नमस्कार है।
* हे सिंहवाहिनी ! सांसारिक भाय से ब्याकुल हूँ। मेरी रक्षा करे। हे महेश्वरी ! मैंने इसी अभिलाषा से आपका पूजन किया।
* हे पार्वती माता ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न होकर मुझे सुख और सौभाग्य प्रदान कीजिये इस प्रकार मंत्रो द्वारा उमा सहित शंकर जी का पूजन करे तथा विधि विधान सहित कथा सुनकर गौ, वस्त्र तथा आभूषण ब्राह्मणो को दान करें। इस प्रकार से पति तथा पत्नी दोनों को एकाग्र चित्त होकर पूजन करें। वस्त्र आभूषण आदि संकल्प द्वारा ब्राह्मण को दक्षिणा दें।
* हे देवि ! इस प्रकार व्रत करने वालों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं फिर वह सात जन्म तक राज्य सुख और सौभाग्य को भोगती है।
* जो स्त्री इस तृतीया के दिन आननहार करती हैं व्रत को नहीं करतीं वह सात जन्म तक वंध्या और विधवा होती हैं।
* जो स्त्री इस व्रत को नहीं करती वह धन और पुत्र के शोक से अधिक दुख को भोगती हैं तथा वह घोर नरक मे जाकर कष्ट पाती हैं।
* इस दिन अन्नाहार करने वाली शूकरी, फल खाने वाली बानरी तथा जल पीने वाली टिटहरी, शर्बत पीने वाली जोंक, दूध पीने वाली सर्पिनी, मांस खाने वाली बाघिनि, दही खाने वाली बिलारी, मिठाई खाने वाली चींटी, सब चीज खाने वाली मक्खी का जन्म पाती है।
* सोने वाली अजगरी, पति को धोखा देने वाली मुर्गी का जन्म पाती है। स्त्रियॉं को परलोक सुधारने केआर लिए यह व्रत करना चाहिए।
* व्रत के दूसरे दिन का व्रत का पारायण के पश्चात चांदी, सोना, ताँबे या कांसे के पात्र मे ब्राह्मण को अन्नदान करना चाहिए।
* इस व्रत को करने वाली स्त्रियाँ मेरे समान पति को पाती हैं। मृत्युकाल में पार्वती जैसे रूप को प्राप्त करती हैं जीवन में सांसरिक सुख को भोगकर परलोक में मुक्ति पाती हैं।
* हजारों अश्वमेघ यज्ञों के करने से जो फल प्राप्त होता है वही मनुष्य को इस कथा के सुनने से मिलता है।
* हे देवि ! मैंने तुम्हारे सम्मुख यह सब व्रतों में उत्तम व्रत को वर्णन किया है जिसके करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है।
|| हरितालिका व्रत कथा समाप्त ||
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